यादों के कैमरे में कैद एक पल ऐसा भी....

 
 
 
जिंदगी भी अजीब पहेली है - कही खुशियां इतनी है कि खर्च ही नहीं होता और कही गम इतने है कि आंसूओं का सैलाब ही नहीं थमता। एक ही Life में एक जैसी Life किसी को नहीं मिलती। तो क्यों ना जो भी जैसा भी है उसका लुत्फ उठा लिया जाये।

बाड़मेर.... गर्मी के लिये Famous.... 50 डिग्री तक पहुंच जाये तो भी सरकार 47-48 डिग्री की घोषणा कर के अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है। 

चातुर्मास प्रवेश हुआ - और गर्मी ने अपना प्रचंड तांडव रूप दिखा दिया - पूरे शहर में सुगबुगाहट शुरू हो गइ.... जैन मुनियों के प्रवेश हो गया - अब बारिश नहीं होगी। जिला प्रमुख ने स्वागत में बात ही बात में लोगो की मनस्थिति पर चुटकी ली.... ये प्रकृति का प्रसाद है किसी के आने से या किसी के जाने से बारिश के आने और नहीं आने का कोइ रिश्ता नहीं है - खैर कार्यक्रम ने सम्पन्नता की चादर ओढ़ ली.... कार्यक्रम में पहुंचे श्रद्धालु समुह भोज का जायका ले रहे थे... और आसमान पर काले कजरारे बादलों की चादर बिछ गइ... बूंदा-बांदी होते होते - बारिश ने "झमाझम" का रूप ले लिया.... और भोज में अफरातफरी मच गइ... लोग अपने हाथों में खाने के लिये चुने Items की थाली थामे अपने ऊपर छत ढूंढने लगे। कुछ ही पलों में भवन के मुहाने पर बना चौक खाली हो गया... और खाना खाकर भीड़ बचते बचाते अपने घर की ओर रुखसत हुइ। 

मगर बारिश सिर्फ पुरे दिन में पांच-दस मिनट के ठहराव को अगर गिनती में शामिल ना करे तो 24 घण्टे कहर ही बरसा दिया था। बारिश थी कि जिद्द पर उतर गइ थी - अब कुछ भी हो रुकना ही नहीं है। दो तिन दिन ये फायदे का सौदा था। मगर धीरे धीरे नुकसानों का अम्बर लग गया.... खेत खलिहानों में... Business में... जन जीवन में... हर जगह... Loss हो रहा था। कुछ ही दुरी पर कवास गांव जलजले में डूब गया... और पानी की निकासी पर भाजपा-कॉंग्रेस की सियासी जंग छिड़ गइ। नतीजा... पानी 6 महीने तक Pass ही नहीं हो पाया... न धरती सोख रही थी... पथरीली जमीन की वजह से... धीरे धीरे पानी विषेला हो गया। बीमारी फैलने लगी - हवा बाड़मेर पहुंची... पहले कंपकंपी... बुखार... शरीर मे अकड़न... जोड़ो में भयानक दर्द और चलना फिरना... Movement बंद... तमाम सावधानी के बावजूद मेरे God Father और मैं दोनों उस बीमारी के शिकार बन गये.... असर हल्का था मगर था जरूर... अखबारों ने उसे "चिकनगुनिया" नाम दिया... हर घर तक चिकनगुनिया की पहुंच बन गइ... किसी को कोइ चाय पिलाने वाला ना मिला... N G O's ने मदद को हाथ उठाये मगर कहां तक ? हॉस्पिटल में Bed तो क्या जमीन पर की गइ व्यवस्थाएं भी चरमराने लगी.... जैन मुनि की जीवन चर्या में " गोचरी " (भिक्षा विधी) Compulsory है... अब कौन लाये हमारे लिये गोचरी... जब दोनों चिकनगुनिया के शिकंजे में कैद हो गये.... God Father ने Inspire किया पूरे डेढ़ दिन बाद लड़खड़ाते कदमों से गोचरी के लिये निकला... दर्द से कहराते हुए... घरों की जिंदगियां हमसे दुशवार थी... फ़ोन पर hotel से Breakfast... Lunch.... Dinner.... Order किये जा रहे थे.... अगर पांच Member है तो पांचों Bed पर थे.... तंदुरुस्त होने का इंतजार कर रहे थे। सामाजिक व्यवस्थाओं ने चिकनगुनिया का काढ़ा पिलाने को अपना मिशन बना लिया। समय सरकता गया... हालात बदलने लगे... चिकनगुनिया शांत हुआ... यह पहला अवसर था जब पर्युषण में प्रवचन नहीं हुआ। यादों के कैमरे में वो एक एक पल अब भी कैद है।

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